मनीपुर आयरन लेडी इरोम शर्मिला पिछले आठ सालों से सेना के विशेषाधिकार (अर्मड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट)
के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठी है। पर उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
जब मैं उससे दिल्ली के राम मनोहर लोहीया अस्पताल में मिला तो उसको देखकर मेरे मुंह से सिर्फ एक ही बात निकली..... ' हे भगवान इस लड़की ने अपनी क्या हालत बना ली है'।
दुबला शरीर लेकिन चहरे पर तेज लिए हुए कम्डोजों के बीच हॉस्पीटल में टहलती रहती है। कोई प्रैस वाला उससे नहीं मिल सकता। उसके भाई के अलावा किसी को मिलने की इजाजत नहीं है। उसके समर्थक भी उस को दुर से देखकर चले जाते हैं । उसको जबरदस्ती खाना खिलाने के लिए उसकी नाक में नली डाल रखी है, जिसके द्वारा उसको दूध देकर जिंदा रखा जा रहा है। उसके दिन की शुरुआत योगा से होती है। नेलशन मंडेला और गांधी जी उसके आदर्श हैं
सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून सन 1958 से उत्तर-पूर्वी राज्यों में लागू है। यह एक ऐसा कानून है, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को महज शक के आधार पर गोली मारने या गिरफ्तार करने का अधिकार सुरक्षा बलों को हासिल है। इस कानून के चलते यहां आए दिन बलात्कार और निर्दोशों को गोली से मारे जाने की घटनाएं सामने आती रहती हैं।
महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने वाली इस लड़की के सत्याग्रह की ओर किसी का कोई ध्यान नहीं जा रहा है। भूख हड़ताल के चलते उसका हर दिन स्वास्थ्य गिरता जा रहा है, जिससे उसके शरिर पर काफी बुरा असर पड़ रहा है।
दो नवंबर, 2000 को दस लोगों को कथित तौर पर असम रायफल के जवानों द्वारा मार दिया गया था। इस धटना से विचलित हुई इरोम शर्मिला ने हादसे के ठीक दूसरे दिन से ही सेना के विशेष अधिकार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठ गई तब से लेकर आज तक उसका अमरण असन आद तक बदसतूर जारी है।
लेकिन दुर्भागपूर्ण जब वो उस काला कानून को खत्म केरने की मांग को लोकर धरने पर बैठी तो पुलिस ने इसे आत्म हत्या करने का प्रयास बताकर उसे गिरफ्तार करके सलाफों के पीछे डाल दिया। कहने को तो हम लोकतांत्रिक देश में रहते है, लेकिन यहां पर कानून लोगों के आधार पर तय किए जाते हैं ।
लेकिन यही धारना अगर ममता बैनर्जी करती हैं तो उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया जाता है। और सरकार को उनकी बिगड़ती स्थिति को देखते ही, केंद्र सरकार का सिंघासन ढगमगा जाता है, और उनकी मांग को एक महीन के भीतर ही मान लिया जाता है। क्या इसलिए कि ममता बैनर्जी एक बरिष्ठ नेता है ओर ईरोम शर्मिला एक छीटी सी सामाजिक कार्यकरता या फिर कोई और बात जिसके चलते कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
सरकारें आईं और चली भी गईं, लेकिन उसको हर बार आश्वान दे दिया जाता है। दिसंबर 2006 को प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह मनीपुर का दौरा करते हैं, लेकिन मनीपुर की आबाम को इस कानून में संशोधन करने का आश्वासन देते हैं। लेकिन इस अश्वासन को ठुकरा दिया जाता है, क्योंकि इरोम शर्मिला को मानना है कि सिर्फ सशोधन से कुछ नहीं होने वाला।
30 जनवरी को सत्याग्रह की शताब्दी पर दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन किया जाता है, जिसमें गांधी जी के गांधीवाद, सत्याग्रह और अंहिसा की जोरदार वकालात की जाती है। लेकिन चर्चा नहीं हुई तो इरोम शर्मिला के अंहिसक विरोध की जो बिना कुछ खाए पीए बदस्तूर जारी है। जब इस सम्मेलन के दौरान कुछ मंत्रीयों से इरोम शर्मिला के बारे में पूछा गया, तो गोल मोल जवाब देते नजर आए, ये है गांधीवाद की बातें करने वालों का असली चहरा। इस सम्मेलन से ऐसा लगता है, कि कांग्रेस महात्मा गांधी को सिर्फ राजनितिक स्वार्थ के लिए ही इस्तमाल करती है।
गांधीवाद की बात तो करती है, लेकिन इसको असल जिंदगी में लागू करना इसके लिए बहूत मुश्किल है। लगे रहो मुन्ना भाई फिल्म में गांधीगिरी की जमकर तारीफ की जाती है। हमारे प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी को भी खूब रास आती है। लेकिन मनमोहन जी को भी इरोम शर्मिला की याद नहीं है। आज गांधी की प्रसंगिता कितनी है, कहना मुश्किल है। आज गांधीवाद किताबों और फिल्मों तक ही सिमट कर रह गया है। अगर ऐसा नहीं होता तो आज बेचारी इरोम शर्मिला की बात पर गोर किया जाता और कुछ न कुछ समाधान जरुर निकाल लिया जाता। और गांधी के आदर्श ढोंग बनकर नहीं रह जाते, बल्की उनका असल जिंदगी में अमल होते दिखाई देता।
गांधीवाद के पथ पर चलने वाली इस लड़की की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। पिछले कई सालों से इस आस में बैठी है कि शायद अब उसकी मांग पर ध्यान दिया जाएगा, लेकिन खत्म करना तो दूर इस मुद्दे पर अबतक कोई गंभीर चर्चा तक नहीं हुई। उस का स्वास्थ्य बहुत गिर चुका है। अगर उसको कुछ हो जाता है, तो उसका जिम्मेदार कोन होगा..?
विष्णु सोनी