Friday, October 30, 2009

Against Racism



MOST OF the friends of mine, remain disagree with me when i say 'we, Indian very hypocrite', it makes them feel insult and sometimes they go upset with my remarks. Indian students are assaulted in Australia, we bring this issue to the whole world. When bhaiya (called people from Uttar Pradesh and Bihar in Mumbai) are beaten up in Mumbai,it upsets the whole nation, even then we critizied Raj Thakre very strongly the way he behaved with them. But what about ourselves, figures provided by the North East Support Center prove that 80 per cent of the people from North Eastern states face some kind of discrimination on the daily basis in the Capital. Even as around 4000 students from the North East take admission to various courses in Delhi University every year, the city has not come to terms with their presence. The center alleged that around half of the girls sexually are harassed in Delhi and NCR. Recently Naga students protested against facing the problems of discrimination at Jantan Mantar in Delhi. I think that real shame for us is this, being educated, we separate them from our society, being civilized society; we are creating an environment of discrimination. Cosmopolitan feature of India society is, "Unity in diversity", but after reporting this sort of incidents tell us, this is just confined within the book and preaching, and we do not put it in act. If Indian students were assaulted in Australia and beaten up Bhaiya in Mumbai upset you....than stop discrimination in your city and take them as the member and part of your society and nation. Say with us! STOP DICRIMINATION.
VISHNU SONI

Friday, October 23, 2009

ऐसा था भगत सिंह




भगत सिंह के पिता सरदार अर्जुन सिंह एक दिन अपने खेतों में पेड़ के नीचे बैठे थे। तभी सरदार अर्जुन सिंह के सर पर डंडा स्पर्श हुआ,सरदार अर्जुन सिंह आह करते हुए चारपाई पर गिर पड़ते हैं, तभी भगत सिंह कहता है, कि ये क्या दादा जी आप अंग्रेजों की गोलीयों से कैसे बच गए। भगत सिंह को गले लगाते हुए उस के दादा जी कहते है, कि बेटा तेरे चाचा जी ने भी देश के लिए जान दी थी, तुझे उनके अभिमान के लिए कुछ करना है। तभी भगत सिंह कहता है मैं अंग्रेजों को देश से निकालूंगा।
एक दिन भगत सिंह की दादी उसको राम-रावण की कहानी सुना रहीं थीं, तभी कहानी सुनते सुनते वो सो गया, लेकिन भगत सिंह की तो आंखों में तो सुखी जनता और आजाद भारत का सपना चल रहा था। भगत सिंह को बडा होते देख 6 साल की उर्म में उसके दादा जी ने उसका दाखिला एक स्कूल में करा दिया और वो निश्चिंत होकर घर वापस आ गए। लेकिन शाम को जब भगत सिंह घर वापस आया तो उसके गाल गुस्से से फूले हुए थे और कहता है कि दादा जी मैं कल से स्कूल नहीं जाउंगा, तो दादा जी ने कहा क्या बात है बेटा, क्या मास्टर जी अच्छे नहीं है क्या ? तो उसने कहा की नहीं मास्टर जी तो अच्छे है, लेकिन मैं उस स्कूल में नहीं पढ़ सकता जहां गोड सेव दि किंग की प्रार्थना होती हो। तो अपने लाडले की इस समस्या का हल निकालते हुए उसे डीएवी स्कूल में दाखिला दिला दिया। उस स्कूल में क्रांतकारियों की कहानी सुनाई जाती थीं, जिसे सुनने में भगत को बड़ा मजा आता था। इस बीच भगत सिंह को पढ़ने लिखने का बहुत शौक लग गया था, उसका अक्सर समय लाईब्रेरी में किताबों और सामाचार पत्रों को पढ़ने में गुजरता था। तभी उसकी मुलाकात अपने ही विचाराधारा रखने वाले सुखदेव से होती है।
जब वो कक्षा सात में आया तो एक दिन वो अखबार पढ़ रहा था, जिसमें जालियावाला बाग हत्याकांड की खबर सुनकर वो बहुत विचलित हो गया और रात भर सो नहीं पाया। घटना के दूसरे दिन भगत सिंह अपने कुछ दोस्तों के साथ जलियांवाला बाग पहुंचा। वहां की मिट्टी अब भी खून से लत पथ थी, तभी भगत सिंह ने उस जमीन को चरण स्पर्श कर उसकी मिट्टी को अपने सर से लगाया और वैसा ही उसके दोस्तों ने भी किया। उधर देर होने के कारण भगत सिंह के दादा जी और उसकी मां परेशान हो रही थी। जब शाम को भगत सिंह घर लौटा तो उसकी मां ने उसकी जमकर पिटाई कर दी और पूंछा कि तू कंहा चला गया था। तब उसने जवाब दिया कि मैं जलियांवाला बाग गया था, जवाब सुनते ही पलभर के लिए संनाटा सा छा गया और उसकी मां की आंखें भर आई और फिर उसने अपने लाल भगत को गले लगा लिया और कहां कहीं जाने से पहले बतातो दिया कर।
भगत सिंह धीरे धीरे जवां होने लगा, सांध्य और प्रभात फेरी का नेत्र्व करने लगा। सुखदेव और भगत सिंह दोनों ही क्रांतकारी संगठन के लिए काम करने लगे। भगत सिंह विदेशी कपड़ों की होली जलाने में हमेशा आगे रहता था।
महात्मा गांधी की सभाओं में जाने लगा। आधी रात का समय था। लाहौर शहर के मजहव मुहल्ले के एक घर में प्रकाश आलोकिक था। भगत सिंह रात को घूर रहा था। भगत सिंह बहुत बेचैन था। देश को आजाद कराने के लिए बेकरार था। भगत सिंह और आजाद के साथ कई क्रांतकारी कमरे में लेटे हुए थे। और बगल में अंग्रेजो के विरोध में लिखे हुए पत्रों का ढेर लगा हुआ था। भगत सिंह के मन में एक ही बात गूंज रहीं थी ‘सायमंड्स वापस जाओ” और उसके जहन में वर्षों को मोर्चा दिख रहा था।
एक दिन लाहौर रेलवे स्टेशन पर लाला लाजपत राय काले झंड़ों के साथ प्रदर्शन कर रहे थे। पुलिस आंदोलन कारियों को पीछे ठकेल रहे थे। लेकिन आंदोलनकारियों के कदम आगे ही बढ़ते जा रहे थे। पुलिस दल को नेत्र्व सकॉट कर रहा था। तभी डीएसपी सेंडर्स ने लाठी बरसाना शुरु कर दिया। इस घटना में लाला लाजपत राय की मौंत हो गई। इस घटना ने भगत सिंह के मन पर गहरा असर पड़ा। गुस्से से लाल भगत सिंह ने लाला लाजपत राय कि चिता के सामने बदला लेने की शपथ ली।

दूसरे ही दिन आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद सहित अन्य क्रांतकारिओ ने स्कॉट को मारने की योजना बनाई। और योजना के तहत ये तीनों लोग –डीएबी कॉलेज के पास इकट्ठे होते हैं। कॉलेज के सामने की पुलिस चॉकी पर उनकी नजर थी। आजाद पेड़ के पीछे छिप गए। भगत सिंह और राजगुरु आजाद के इशारे मिलने का इंतजार करने लगे। दोपहर को चार बज रहे थे। सेंडर अपनी मॉटर साइकिल ने वहां से गुजर रहा था। तभी आजाद सेंडर को अपनी ओर आते देख, भगत सिंह और राजगुरु को इशारा कर देते है, इशारा मिलते ही, राजगुरु सेंडर के सामने आकर उसको गोली मार देते हैं, गोली गले मे लगते ही वो जमीन पर गिर पड़ता है। भगत सिंह उसके सामने आता है,अंगारा उगल रहीं भगत सिंह की आंखें देख कर सेंडर डर जाता है, और थर थऱ कांपने लगता है। फिर भगत सिंह सेंडरस की खोपडी को निशाना साधते हुए उस पर तीन गोली दाग देता। गोली लगते ही, सेंडर वहीं पर डेर हो जाता है। गोली मारते ही भगत सिंह और राजगुरु भी वहां से साइकिल से फरार हो जाते हैं। इस घटना के बाद पुलिस पागलों की तरह भगत सिंह और राजगुरु को ढूंढ ने में जुट गई। चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह को पहचाने जाने के डरसे बाल और दाड़ी कटवाने के लिए कहते है। और इस तरह एक सरदार अपनी दाड़ी और बाल कटवा कर हेट पहन लेता है। भगत सिंह की नजर में धर्म से बड़ा देश था

क्रांतकारियों द्वारा बनाया गया पहला बंब का सफल परिक्षण झांसी शहर में किया जाता है, और इसके बाद सभी एक दुसरे से विदाई लेकर अपने अपने काम में लग जाते हैं। उसी दिन दिल्ली असेंबली में दो कानून पास होने वाले थे, पहला कानून मजदूरों की हड़ताल पर रोक लगना और दुसरा आजादी की लडाई को कुचलना था। बटकेश्वर दत्त, भगत सिंह, भगवती चरण और सुख देख एक साथ बैठे हुए थे। कानून पास होने की बात को लेकर काफी चिंतित थे। भगवती चरण ने कहा कि इस कानून के बनने से पहले कुछ करना होगा। इस पर भगत सिंह ने कहा कि हम असेंबली में बंब फेंक कर इस साभा को भंग कर देंगे। तब सुख देव कहते हैं इसके लिए सभा की रचना को समझ कर काम को अंजाम देना होगा। और फिर सभी लोग इस काम को सफल बनाने में जुट गए। गेलरी में भगत सिंह और वटकेश्वर दत्त बैठ जाते हैं। भगत सिंह की नजर सर जॉन बूसटर पर थी। सर जॉन बूसटर जैसे ही बोलने के लिए उठे भगत सिंह ने सभा के बोचों बीच हथगोला फेंक दिया लोग कुछ समझ पाते इसके तुरंत बाद वटकेश्वर दत्त ने दूसरा हथ गोला फेंक दिया। वाय सारय शांत खडे़ थे तभी भगत सिंह उनकी मेज पर रखे गुलदस्ते में गोली मारकर भगत सिंह अंग्रेजी सरकार के कायदे कानून की धज्जीयां उडा देते हैं। और पूरा वातावरण धुंध से भर जाता है। तुरंत ही पुलिस दोनों पर झपट पड़ती है और दोनों को गिरफ्तार कर लेती है।
भगत सिंह और वटकेश्वर दत्त दोनों ही इंकलाव जिंदावाद और वंदे मातरम को नारा लगाते हुए बहार आते हैं। सेशन जज मिडिलटन के समक्ष बंब कांड का मुक्दमा शुरु होता है। अदालत में भगत सिंह कहते हैं कि........सवत्रंता प्रतेक का जन्म सिद्ध अधिकार है, इन जुल्मी नियमों और कानूनों के प्रति जनता को जागरुक करना, सरकार को चेतावनी देना, जन जन में क्रांती की ज्वाला जगाना ही हमारा उद्देश है, और आज हमारा उद्देश पूरा हो गया ।
सेशन जज ने भगत सिंह को उर्म कैद की सजा सुना दी। उधर लाहौर में सुखदेव और अन्य क्रांतकारी बंब बनाने में लगे थे। बंब में इस्तमाल होने वाले कवचों को एक लौहार की दुकान पर सुखदेव बनवा रहे थे। एसेंबली में बंब फैंके जाने के मामले को लेकर शहर में जगह जगह गुप्तचर पुलिस लगी हुई थी। इनही गुप्तचरों में से एक की नजर लौहार की दुकान पर पड़ जाती है, जहां सुखदेव करतूसों के लिए कवर बनवा रहे थे। जैसे ही सुखदेव लौहार की दुकान ने बहार निकलते है, उनके पीछे गुप्तचर पुलिस लग जाती हैं। और सुख देव को धेर कर पकड़ लेती है। हावालात में सुख देव की बेरहमी से पिटाई की जाती है वो कुछ नहीं बाताते है, लेकिन अन्य कार्यकरता क्रांतकारियों के राज का पर्दाफाश देते है, जिसके चलते जगह-जगह छापे मारी की जाती है, और कई जगहों से लोगों को गिरफ्तार किया जाता है।
उधर सेंडरस की हत्या में भगत सिंह के शामिल होने की खबरें आने लगती हैं, जिसके चलते भगत सिंह को लाहौर सेंट्रल भेज दिया जाता है। इधर राज गुरु को महाराष्ट्र से गिरफ्तार करके सेंट्रल जेल में डाल दिया जाता है। उन दिनों सेंट्रल जेल में कैदी राज बंदी होते थे। जेलों में बंद कैदियों ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ उपवास शुरु कर दिए। इसे गुस्साए पुलिसवालों ने कैदीयों के साथ जोर जबरदस्ती से खाना खिलाना शुरु कर दिया, इतना ही नहीं कैदियों की छाती पर बैठ कर उनके मुंह में खाना ठूसना शुरु कर दिया। लेकिन क्रांतकारी नहीं बदले। हर तरफ जेल में एक ही नारा सुनाई पड़ता था। अंग्रेजी सरकार मुर्दावाद।

रात्री के समय जेल में देश भक्ती के गाने गाए जाते थे और भगत सिंह और सुखदेव की बेडियों से तो और ही सुर निकलता था। संपूर्ण पंजाब और बंगाल में अंतोष की लहर दौड़ गई। साथ ही साथ अन्य राज्यों में भी इस ये लहर का असर देखने को मिलने लगा। असंतोष की इस लहर को देखते हुए, वायसराय इरविन ने लाहौर कि स्पेशल ट्रिब्यूनल के समक्ष भगत सिंह को पेश होने को कहा गया। तीन न्यायधिशों की बैंच के बीच मामला शुरु हुआ। इस समिति का फैंसला अंतिम बनाने के लिए पुन: अपील पर रोक लगा दी। भगत सिंह ने इस बैंच में कहा कि तुम्हारी ये समिति प्रजातंत्र के खिलाफ है, तुम्हारे सामने जो अत्याचार हो रहे हैं उनको रोकने में तुम असमर्थ हो। इस बात पर आपत्ती जताते हुए न्यायमुर्ती ने मेज पर हथाड़ा ठोकते हुए कहा कि न्यायालय पर आरोप लगाना तुम्हारा काम नहीं है। तुम तो सिर्फ अपने बचने की बात करो। मैं तुम्हें कल तक का समय देता हूं। इस पर राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह ने हाथों में लेकर इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाया।
7 अक्टूबर,1930 को उनको फांसी की सजा सुना दी गई। दूसरे ही दिन ये खबर पूरे देश में आग की तरह फैल गई। समाचार पत्रों ने सरकार की नितियों के खिलाफ उंगली उठाई गई। हर तरफ सरकार की बुराई होने लगी। फांसी की सजा होते ही मंदिरों,मसजिदों और गुरुद्वारों में क्रांतकारियों के लिए दुआए मागे जाने लगीं। इधर जनता के प्रतिनिधियों ने महात्मा गांधी से मामले में दखल देने को कहा लेकिन महात्मा गांधी जी ने इस मामले में कुछ भी करने से साफ इंकार कर दिया। फिर प्रतिनिधियों ने जेल जाकर भगत सिंह से अंग्रेजी सरकार से छामा मागने को कहा, जिसे तीनों ने नकार दिया।
24 मार्च को तीनों को फांसी देने का निश्चय किया गया। फांसी लगने से ठीक एक दिन पहले भगत सिंह के बूड़े दादा जी और उसकी मां उससे जेल में मिलने जाती हैं। भगत सिंह के दादा अपने लाड़ेले को बेड़ियों में जकडा देखकर बहुत बेदना हुई। सिंह ने हंसते हुए अपने दादा जी से कहा है, हम लोग राजबंदी है, वो लोग हमें सोने के गहनों से थोड़े ही सजाएगें। ये लोहे के गहने है। ऐसा सुनकर भगत सिंह की मां की आंखों भरआईं। सिंह अपनी मां के पास गया ओर कहा कि लोग क्या सोचेंगे की भगत सिंह की मा इतनी कमजोर और कायर है। इतना सुनते ही भगत सिंह की मां के मन में अपने बेटे के लिए अभीमान जाग उठा।
24 मार्ट करीब आ रही थी। फांसी की तैयारीयां तेज होने लगी। उसी दिन अधीकारियों की एक गुप्त मिटिंग होती है, मिटिंग में अधीकारिओं की चिंता का करण भगत सिंह की बढ़ती लोकप्रियता थी। अधीकारिओं को फांसी के दिन पूरे देश में हिंसा और दंगा भड़कने का डर सता रहा था। तब इस मिटिंग में भगत सिंह को एक दिन पहले यानी 23 मार्च को फांसी देने का निर्णय लिया गया। 23 मार्च की सुबह हुई। भगत सिंह की कोठरी का दरवाजा दोपहर को खोला जाता है। तभी जेलर कहता है कि आज ही तुम को फांसी होगी। भगत सिंह किताब रख कर बोलता है कि मैं तैयार हूं। मेरी बेडि़या खोल दो। और मेरा चहरा मत ढकना। जेलर कहता हैं कि मैं बेडि़या तो खोल दूंगा, लेकिन चहरा को तो ढकना ही पढेगा। इस नियम को नहीं तोड़ा जा सकता। उस दिन सभी कैदियों को समय से पहले ही उनको कोठरियों में बंद कर दिया जाता है। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु तीनों ने स्नान किया। तीनों ने एक दुसरे को गले लगाया। बीच में भगत सिंह, बांय तरफ राजगुरु और दांय तरफ सुखदेव के कदम फांसी के तखते की ओर चल पड़ते हैं। जेलों में बंद कैदी अपने लाड़ले क्रांतकारियों को आंसूओं कि विदाई देने लगे। तीनों का बुलंद सुर जेल में गूंज रहा था, कि मेरा रंग दे बसंती चोला। कैदी नारा लगा रहे थे, भगत सिंह अमर रहे, सुखदेव अमर रहे, राजगुरु अमर रहे। फिर तीनों क्रांतकारियों ने इंकलाव कहते हुए कैदियों से विदाई ली। उनके खुले हाथ देखकर अंग्रेज कमीशन को धक्का लगा। सिंह ने उनसे कहा कि आप बहुत भाग्यशाली है कि आज आप को साक्षात देखने को मिलेगा कि भारतीय क्रांतकारि किस तरह मौत को गले लगाते हैं। मौत मतलब... परमेश्वर। उनसे मिलने जैसा दूसरा आनंद और क्या होगा। तानों ने बंदे मातरम का नारा लगाया और फांसी के तखते पर पहुंच गए।
फांसी का फंदा तीनों का इंतजार कर रहा था। तभी भगत सिंह ने निर्भय होकर कहा की हमें अपने उदधोश वाक्य कहने की अनुमति दी जाए। जेल अधीकारियों ने एक दूसरे को देखकर इशारा किया। फिर तीनों ने बंदे मातरम का नारा लगाते हुए कहा कि अब दोस्तों हम स्वर्ग में मिलेंगे। जल्लाद ने तीनों का मुंह कपडे़ से डक दिया। और इशारा मिलते ही। हत्था खींच दिया गया। और इस तरह भारत माता के तीनों पुत्र उसके लिए शाहीद हो गए।

विष्णु सोनी

Tuesday, October 13, 2009

Press vs People



आज मीडिया में दिखाए जाने वाली खबरों को लेकर हमेशा सवाल उठाए जाते हैं,कि मिडीया क्या दिखा रहा है,किस तरह की खबरें दिखाई जा रहीं हैं। मिडीया का स्तर गिरता जा रहा है। मैं आप से सहमत हूं,कि आज का मिडीया गैरजिम्मेदार हो गया है। लेकिन मैं आप से एक सवाल पूछना चाहता हूं,कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है:चैनल या फिर हम दर्शक?। हम लोग ही तो एसे दिखाने के लिए मजबूर करते हैं। सच का सामना शो ने पहले ही दिन रिकॉर्ड तोड़ दिया। हिट तो हम दर्शकों ने किया... फिर चैनल को दोष क्यों दिया जा रहा है। चाहते तो हम इस शो को न देख कर इसको धुल चटा सकते थे,जिससे आने वाले समय में इस तरह के शोज पर अपने आप ही रोक लग जाती...और कोई प्रोड्यूसर ऐसा कार्यक्रम बनाने कि हिम्मत नहीं जुटा पाता,लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। हम दर्शक अच्छे कार्यक्रम देख कर अच्छे शोज को बढ़ावा क्यों नहीं देते। एक चैनल को बनाने में करोडों रुपय खर्च होते हैं। इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा जी को कहते हुए सुना था, कि जब चैनल शुरु किया गया था तो गम्भीर खबरों को दिखाया गया था लेकिन दर्शकों ने इन की खबरों को महत्व नहीं दिया और चैनल इतने घाटे में चला गया,कि जिंदगी भर की कमाई चली गई और वो दिन दूर नहीं था,कि जब वो फुटपाथ पर आ जाते और फिर मजबूरी में उनको भूत प्रेत का सहारा लेना पड़ा,दूसरा उदाहरण मैं आप लोगों को NDTV इंडिया को देता हूं। NDTV इंडिया सालों से गम्भीर खबरें दिखाता आया है,लेकिन हम दर्शकों ने उस चैनल की गम्भीरता को कोई महत्व नहीं दिया और चैनल पिछड़ने लगा। चाहते तो हम दर्शक इसकी खबरों को देख कर सबसे उंचा पहुंचा देते,और ऐसा मानक सेट करते की सारे चैनलों को मजबूरी में देश और समाज से जुड़ी खबरें दिखानी पड़ती,लेकिन दर्शको को ये सब रास नहीं आता और दर्शकों ने साबित कर दिया की हमें भूत प्रेत ही देखना है,हमें तो राखी सावंत को देखना है..करीना और सैफ की किस का किस्सा सुनने में ही मजा आता है। आज गौर किया जाए तो NDTV इंडिया भी अब देश और दुनिया या फिर समाज से जुड़ी खबरों के साथ ही साथ यू ट्यूब विडियो के मनोरजन से भरे को क्लिप दिखाने लगा है। खबरों से समझौता शुरु हो गया है। हम लोगों ने उस को मजबूर कर दिया है कि अगर चैनल चलाना है तो आप को भी भूत प्रेत या मसाला टाईप का कुछ आइटम पेश करना ही होगा,तभी चैनल चल पाएगा। सो NDTV इंडिया टावी भी अब खबरों के साथ खेल रहा है। उसे भी दर्शकों का टेस्ट पता है। उसके पास भी दर्शक के लिए अच्छा मैनू है। वो वही परोसेगा दो दर्शक देखना चाहेगा। इसके लिए जिम्मेदार कौन है चैनल या फिर हम दर्शक। रिमोट आप के हाथ में है। चुनाव आप को करना है।

विष्णु सोनी