...हां मुझे भी उतना ही गुस्सा आ रहा है,जितना की आप को। आखिर यह कैसे हो सकता है, कि एक नाबालिग लड़की रुचिका के साथ बलात्कार की कोशिश की जाति है,और अरोपी का कोई कुछ नहीं बिगड़ पाता है,ना ही पुलिस प्रशासन,और ना ही सीबीआई और ना ही न्यायालय ही उसको सजा दे पाती है। हां मैं उस इंसान की शक्ल में भेड़िये एसपीएस राठौर की बात कर रहा हूं जो, हरियाणा का पूर्व डीजीपी रह चुका है,जिसे अपने काले कारनामों को छुपाने के लिए अपने अधीकारों का दुरुपयोग तो किया,बावजूद अपने आप को बचाना नहीं पाया। जेल से बाहर आते हुए उसका और उसकी पत्नी का मुस्कुराता हुआ चेहरा यही बता रहा था कि कानून उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उसको पता है कि कानून से खेलना तो उसके बांय हाथ का खेल है। और कुछ हद तक वो सफल ही हो गया था। लेकिन कहते है कि जब किसी के पाप का घड़ा भरता है तो इसी तरह फूटता है, जैसा की राठौर का। जितना प्रशासन ने उसके साथ अन्याय किया, कुछ हद तक हम(प्रेस)ने भी किया। हां...इसलिए कि अगर यही चुस्ती प्रेस ने अगर 19 साल पहले दिखाई होती तो,शायद आज रुचिका हमारे बीच होती..सानिया मिर्जा और सोनिया नेहवाल कि तरह वो भी एक अच्छी टेनिस खिलाड़ी बनकर उभर रही होती। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
इस मामले ने हमारे तंत्र की कलई खोल कर रख दी है। ये अपने आप में एक शर्मनाक मामला है। प्रताड़ना के बाद प्रताड़ना। जरा सोचिए,किस तरह से उसने सहा होगा। अखिर वो एक 14 साल कि लड़की थी। ज्यादा बर्दास्त नहीं कर सकीं और अपनी जान खुद लेली। आखिर उसकी वजह से उसके परिवार को मिल रही पुलिस से प्रताड़ना को वो कब तक सहती। टैनिस खेलने से रोका गया,स्कूल ने बाहर निकलवा दिया जाता है,उसके भाई पर एक के बाद जाली केस ठोके गए,वो बात अलग है कि एक भी केस में उसको सजा नहीं होती है। राठौर का अत्याचार यहीं तक नही रुकता है,बल्कि उसे पिता के खिलाफ भी भ्रष्ट्राचार का मामला लगा कर,उनको नौकरी से निकलवा दिया जाता है। और इस सब मैं साथ दिया हमारे उन नेताओं ने जो गीता की कमस खाकर अपनी जनता को वचन देते हैं, कि वो हमेशा संविधान में लिखे कानून का ईमानदारी से पालन करेंगे और किसी के साथ अन्याय नही होने देंगे।
कहते है कि न्याय होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। इस मामले में एसा कुछ नहीं दिखाई पड़ा। न्याय के नाम पर रुचिका के साथ एसा मजाक,जिसे आज तक किसी ने नही देखा होगा। इस मामले को फिर से शुरु करने की बात कही जा रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय पदक वापस लेने की बात कर रहा है,इस बात से भी एक बात और जाहिर हो गई कि पदक किस तरह के अधिकारियों को दिए जाते,और वो किस लायक होते हैं। और किस कि अनुशंसा पर दिये जाते है। सरकार द्वारा राठौर को डीजीपी के तौर पर मिलने वाली सुविधाऔं पर कटौती की बात कर रही है, मुझे तो लगता है, कि एसे लोगों को सरकार द्वारा दी जा रही सभी सुविधाओं से वंचित रखना चाहिए,जिससे आने वालों को कुछ सबक मिल सके। लेकिन सबसे बड़ा प्रशन यही है कि क्या एसपीएस राठौर उन पुलिस वालों के साथ भी कार्रवाई की जाएगी,जिन्होंने इस केस में राठौर की मदद की? और क्या उन तत्कालीन मुख्यमंत्रियों के भी खिलाफ कार्रवाई की जाएगी,जिन्होंने मामले को दबाने में राठौर की मदद की- चाहे वो ओमप्रकाश चौटाला हों और या फिर कोई और?
जेसिका लाल, नितीश कटारा हात्याकांड,प्रियदर्शनी मट्टू मामला हो,या फिर रुचिका मामला, आखिर एसा क्यों होता है, कि जब कोई मामला तूल पकड़ा है,तभी आनन-फानन में नियम कायदे बनाने की बात होती है। और बाद में फिर वही ढाक के तीन पांत। अगर रुचिका मामले में ही सही तरह से कार्रवाई हुई होती,तो राठौर साहब अभी हवालात की हवा खा रहे होते। कानून का पारदर्शिता से क्रियान्वयन ना होने के चलते राठौर जैसे लोग कोर्ट से मुस्कुराकर निकलते है,और रुचिका के पिता जैसे लोग आंसू बहाते रहते हैं।
विष्णु सोनी
Saturday, December 26, 2009
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