Saturday, December 26, 2009

नहीं बचकर जाने देंगे रुचिका के कातिल को....

...हां मुझे भी उतना ही गुस्सा आ रहा है,जितना की आप को। आखिर यह कैसे हो सकता है, कि एक नाबालिग लड़की रुचिका के साथ बलात्कार की कोशिश की जाति है,और अरोपी का कोई कुछ नहीं बिगड़ पाता है,ना ही पुलिस प्रशासन,और ना ही सीबीआई और ना ही न्यायालय ही उसको सजा दे पाती है। हां मैं उस इंसान की शक्ल में भेड़िये एसपीएस राठौर की बात कर रहा हूं जो, हरियाणा का पूर्व डीजीपी रह चुका है,जिसे अपने काले कारनामों को छुपाने के लिए अपने अधीकारों का दुरुपयोग तो किया,बावजूद अपने आप को बचाना नहीं पाया। जेल से बाहर आते हुए उसका और उसकी पत्नी का मुस्कुराता हुआ चेहरा यही बता रहा था कि कानून उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उसको पता है कि कानून से खेलना तो उसके बांय हाथ का खेल है। और कुछ हद तक वो सफल ही हो गया था। लेकिन कहते है कि जब किसी के पाप का घड़ा भरता है तो इसी तरह फूटता है, जैसा की राठौर का। जितना प्रशासन ने उसके साथ अन्याय किया, कुछ हद तक हम(प्रेस)ने भी किया। हां...इसलिए कि अगर यही चुस्ती प्रेस ने अगर 19 साल पहले दिखाई होती तो,शायद आज रुचिका हमारे बीच होती..सानिया मिर्जा और सोनिया नेहवाल कि तरह वो भी एक अच्छी टेनिस खिलाड़ी बनकर उभर रही होती। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
इस मामले ने हमारे तंत्र की कलई खोल कर रख दी है। ये अपने आप में एक शर्मनाक मामला है। प्रताड़ना के बाद प्रताड़ना। जरा सोचिए,किस तरह से उसने सहा होगा। अखिर वो एक 14 साल कि लड़की थी। ज्यादा बर्दास्त नहीं कर सकीं और अपनी जान खुद लेली। आखिर उसकी वजह से उसके परिवार को मिल रही पुलिस से प्रताड़ना को वो कब तक सहती। टैनिस खेलने से रोका गया,स्कूल ने बाहर निकलवा दिया जाता है,उसके भाई पर एक के बाद जाली केस ठोके गए,वो बात अलग है कि एक भी केस में उसको सजा नहीं होती है। राठौर का अत्याचार यहीं तक नही रुकता है,बल्कि उसे पिता के खिलाफ भी भ्रष्ट्राचार का मामला लगा कर,उनको नौकरी से निकलवा दिया जाता है। और इस सब मैं साथ दिया हमारे उन नेताओं ने जो गीता की कमस खाकर अपनी जनता को वचन देते हैं, कि वो हमेशा संविधान में लिखे कानून का ईमानदारी से पालन करेंगे और किसी के साथ अन्याय नही होने देंगे।
कहते है कि न्याय होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। इस मामले में एसा कुछ नहीं दिखाई पड़ा। न्याय के नाम पर रुचिका के साथ एसा मजाक,जिसे आज तक किसी ने नही देखा होगा। इस मामले को फिर से शुरु करने की बात कही जा रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय पदक वापस लेने की बात कर रहा है,इस बात से भी एक बात और जाहिर हो गई कि पदक किस तरह के अधिकारियों को दिए जाते,और वो किस लायक होते हैं। और किस कि अनुशंसा पर दिये जाते है। सरकार द्वारा राठौर को डीजीपी के तौर पर मिलने वाली सुविधाऔं पर कटौती की बात कर रही है, मुझे तो लगता है, कि एसे लोगों को सरकार द्वारा दी जा रही सभी सुविधाओं से वंचित रखना चाहिए,जिससे आने वालों को कुछ सबक मिल सके। लेकिन सबसे बड़ा प्रशन यही है कि क्या एसपीएस राठौर उन पुलिस वालों के साथ भी कार्रवाई की जाएगी,जिन्होंने इस केस में राठौर की मदद की? और क्या उन तत्कालीन मुख्यमंत्रियों के भी खिलाफ कार्रवाई की जाएगी,जिन्होंने मामले को दबाने में राठौर की मदद की- चाहे वो ओमप्रकाश चौटाला हों और या फिर कोई और?
जेसिका लाल, नितीश कटारा हात्याकांड,प्रियदर्शनी मट्टू मामला हो,या फिर रुचिका मामला, आखिर एसा क्यों होता है, कि जब कोई मामला तूल पकड़ा है,तभी आनन-फानन में नियम कायदे बनाने की बात होती है। और बाद में फिर वही ढाक के तीन पांत। अगर रुचिका मामले में ही सही तरह से कार्रवाई हुई होती,तो राठौर साहब अभी हवालात की हवा खा रहे होते। कानून का पारदर्शिता से क्रियान्वयन ना होने के चलते राठौर जैसे लोग कोर्ट से मुस्कुराकर निकलते है,और रुचिका के पिता जैसे लोग आंसू बहाते रहते हैं।


विष्णु सोनी

Monday, November 9, 2009

कहीं ऐसा न हो...




बेटा राहुल जल्दी उठजा... लड़की वाले तुझे आज देखने आ रहे हैं... मां थोड़ा और सोलेने दो न... बहुत नींद आ रही है। थोड़ी देर बाद राहुल की मां फिर पुकारती है.. अरे बेटा राहुल... अब तो उठजा... देख 9 बज गए है... और धूप भी कितनी निकल आई है.
इतना कह कर मां झट से किचिन में जाती है और चाय देकर बोलती है - ले इसे पीले और फटाफट जा शेव करवा कर आ... ओर हां फेशियल भी करवा लेना, जिससे कि तू एक दम चकाचक दिखे।
राहुल शेव करवा कर आता और नहाने चला जाता है. तभी राहुल की मां अलमारी में से उसके कपडे़ ला कर बोलती है – ये ले पीटर इंग्लैंड की शर्ट और डेनिम का पैंट...ये तुझ पर बहुत अच्छे लगेंगे... इसको पहन कर जल्दी तैयार हो जा, लड़की वाले तुझे देखने के लिए अभी आने वाले ही होंगे. तभी दरवाजे़ पर बैल बजती हैं. राहुल की मां तुरंत दरवाजा खोलती है- अरे ! आप लोग आ गए...अंदर आईए। तभी पुछती हैं – आप लोगों को घर ढुंढने में कोई परेशानी तो नही हुई. इतने हाल-चाल लेने के बाद वो अंदर जाती हैं... और कहती है... बेटा तैयार तो हो गया है न ? ... ले ये क्रीम लगा कर जल्दी आ जाना.
इतना कह कर राहुल की मां वापस मेहमानों के पास आकर बैठ जाती है. तभी लडकी वाले बोलते है – लडके को तो बुलाइए !
तभी राहुल चाय की ट्रे लेकर डरता हुआ रुम में आता है...और झुकी हुई नज़रें से चाय आगे बढ़ता है. चाय देने के बाद राहुल सर झुकाए हुए सोफे पर बैठ जाता है... इस बीच
उस के मन में कई सवाल कोंधते रहते हैं... पता नही क्या-क्या पुछा जाएगा...?, क्या होगा ?, क्या ये भी मुम्बाई वालों की तरह लोट जाऐंगे या फिर... तभी उसके कानों में अचानक आवाज़ सुनायी पड़ती है - राहुल बेटा क्या क्या आता है तुमको...?, राहुल जवाब देता है- झाडू लगा लेता हूं...चाय बना लेता हूं... कपडे़ धो लेता हूं.. और बाकी के काम भी सीख लूंगा... तभी लड़की बीच में टोकती हुई बोलती है.. वो तो सब ठीक है...पर ये बताओ की कितना कमा लेते हो... राहुल बोलता है - मैं इतना कमा लेता हूं कि ज़िंदगी भर आप की बेटी को कोई तकलीफ नही होने दूंगा. इतनी बात चीत के बाद लड़की और उसके माता पिता उठ हुए बोलते है, वैसे लड़का तो मुझे पसंद है.. लेकिन इस का जवाब तो हम लोग लड़की से पूछ कर ही दे पाऐंगे..इतना कह कर वो लोग चले जाते है. पर राहुल को का आज भी उनके जवाब का इंतजार है। अगर भ्रूण हत्याएं नही रुकी तो वो दिन दूर नही जब...

विष्णु सोनी

Friday, October 30, 2009

Against Racism



MOST OF the friends of mine, remain disagree with me when i say 'we, Indian very hypocrite', it makes them feel insult and sometimes they go upset with my remarks. Indian students are assaulted in Australia, we bring this issue to the whole world. When bhaiya (called people from Uttar Pradesh and Bihar in Mumbai) are beaten up in Mumbai,it upsets the whole nation, even then we critizied Raj Thakre very strongly the way he behaved with them. But what about ourselves, figures provided by the North East Support Center prove that 80 per cent of the people from North Eastern states face some kind of discrimination on the daily basis in the Capital. Even as around 4000 students from the North East take admission to various courses in Delhi University every year, the city has not come to terms with their presence. The center alleged that around half of the girls sexually are harassed in Delhi and NCR. Recently Naga students protested against facing the problems of discrimination at Jantan Mantar in Delhi. I think that real shame for us is this, being educated, we separate them from our society, being civilized society; we are creating an environment of discrimination. Cosmopolitan feature of India society is, "Unity in diversity", but after reporting this sort of incidents tell us, this is just confined within the book and preaching, and we do not put it in act. If Indian students were assaulted in Australia and beaten up Bhaiya in Mumbai upset you....than stop discrimination in your city and take them as the member and part of your society and nation. Say with us! STOP DICRIMINATION.
VISHNU SONI

Friday, October 23, 2009

ऐसा था भगत सिंह




भगत सिंह के पिता सरदार अर्जुन सिंह एक दिन अपने खेतों में पेड़ के नीचे बैठे थे। तभी सरदार अर्जुन सिंह के सर पर डंडा स्पर्श हुआ,सरदार अर्जुन सिंह आह करते हुए चारपाई पर गिर पड़ते हैं, तभी भगत सिंह कहता है, कि ये क्या दादा जी आप अंग्रेजों की गोलीयों से कैसे बच गए। भगत सिंह को गले लगाते हुए उस के दादा जी कहते है, कि बेटा तेरे चाचा जी ने भी देश के लिए जान दी थी, तुझे उनके अभिमान के लिए कुछ करना है। तभी भगत सिंह कहता है मैं अंग्रेजों को देश से निकालूंगा।
एक दिन भगत सिंह की दादी उसको राम-रावण की कहानी सुना रहीं थीं, तभी कहानी सुनते सुनते वो सो गया, लेकिन भगत सिंह की तो आंखों में तो सुखी जनता और आजाद भारत का सपना चल रहा था। भगत सिंह को बडा होते देख 6 साल की उर्म में उसके दादा जी ने उसका दाखिला एक स्कूल में करा दिया और वो निश्चिंत होकर घर वापस आ गए। लेकिन शाम को जब भगत सिंह घर वापस आया तो उसके गाल गुस्से से फूले हुए थे और कहता है कि दादा जी मैं कल से स्कूल नहीं जाउंगा, तो दादा जी ने कहा क्या बात है बेटा, क्या मास्टर जी अच्छे नहीं है क्या ? तो उसने कहा की नहीं मास्टर जी तो अच्छे है, लेकिन मैं उस स्कूल में नहीं पढ़ सकता जहां गोड सेव दि किंग की प्रार्थना होती हो। तो अपने लाडले की इस समस्या का हल निकालते हुए उसे डीएवी स्कूल में दाखिला दिला दिया। उस स्कूल में क्रांतकारियों की कहानी सुनाई जाती थीं, जिसे सुनने में भगत को बड़ा मजा आता था। इस बीच भगत सिंह को पढ़ने लिखने का बहुत शौक लग गया था, उसका अक्सर समय लाईब्रेरी में किताबों और सामाचार पत्रों को पढ़ने में गुजरता था। तभी उसकी मुलाकात अपने ही विचाराधारा रखने वाले सुखदेव से होती है।
जब वो कक्षा सात में आया तो एक दिन वो अखबार पढ़ रहा था, जिसमें जालियावाला बाग हत्याकांड की खबर सुनकर वो बहुत विचलित हो गया और रात भर सो नहीं पाया। घटना के दूसरे दिन भगत सिंह अपने कुछ दोस्तों के साथ जलियांवाला बाग पहुंचा। वहां की मिट्टी अब भी खून से लत पथ थी, तभी भगत सिंह ने उस जमीन को चरण स्पर्श कर उसकी मिट्टी को अपने सर से लगाया और वैसा ही उसके दोस्तों ने भी किया। उधर देर होने के कारण भगत सिंह के दादा जी और उसकी मां परेशान हो रही थी। जब शाम को भगत सिंह घर लौटा तो उसकी मां ने उसकी जमकर पिटाई कर दी और पूंछा कि तू कंहा चला गया था। तब उसने जवाब दिया कि मैं जलियांवाला बाग गया था, जवाब सुनते ही पलभर के लिए संनाटा सा छा गया और उसकी मां की आंखें भर आई और फिर उसने अपने लाल भगत को गले लगा लिया और कहां कहीं जाने से पहले बतातो दिया कर।
भगत सिंह धीरे धीरे जवां होने लगा, सांध्य और प्रभात फेरी का नेत्र्व करने लगा। सुखदेव और भगत सिंह दोनों ही क्रांतकारी संगठन के लिए काम करने लगे। भगत सिंह विदेशी कपड़ों की होली जलाने में हमेशा आगे रहता था।
महात्मा गांधी की सभाओं में जाने लगा। आधी रात का समय था। लाहौर शहर के मजहव मुहल्ले के एक घर में प्रकाश आलोकिक था। भगत सिंह रात को घूर रहा था। भगत सिंह बहुत बेचैन था। देश को आजाद कराने के लिए बेकरार था। भगत सिंह और आजाद के साथ कई क्रांतकारी कमरे में लेटे हुए थे। और बगल में अंग्रेजो के विरोध में लिखे हुए पत्रों का ढेर लगा हुआ था। भगत सिंह के मन में एक ही बात गूंज रहीं थी ‘सायमंड्स वापस जाओ” और उसके जहन में वर्षों को मोर्चा दिख रहा था।
एक दिन लाहौर रेलवे स्टेशन पर लाला लाजपत राय काले झंड़ों के साथ प्रदर्शन कर रहे थे। पुलिस आंदोलन कारियों को पीछे ठकेल रहे थे। लेकिन आंदोलनकारियों के कदम आगे ही बढ़ते जा रहे थे। पुलिस दल को नेत्र्व सकॉट कर रहा था। तभी डीएसपी सेंडर्स ने लाठी बरसाना शुरु कर दिया। इस घटना में लाला लाजपत राय की मौंत हो गई। इस घटना ने भगत सिंह के मन पर गहरा असर पड़ा। गुस्से से लाल भगत सिंह ने लाला लाजपत राय कि चिता के सामने बदला लेने की शपथ ली।

दूसरे ही दिन आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद सहित अन्य क्रांतकारिओ ने स्कॉट को मारने की योजना बनाई। और योजना के तहत ये तीनों लोग –डीएबी कॉलेज के पास इकट्ठे होते हैं। कॉलेज के सामने की पुलिस चॉकी पर उनकी नजर थी। आजाद पेड़ के पीछे छिप गए। भगत सिंह और राजगुरु आजाद के इशारे मिलने का इंतजार करने लगे। दोपहर को चार बज रहे थे। सेंडर अपनी मॉटर साइकिल ने वहां से गुजर रहा था। तभी आजाद सेंडर को अपनी ओर आते देख, भगत सिंह और राजगुरु को इशारा कर देते है, इशारा मिलते ही, राजगुरु सेंडर के सामने आकर उसको गोली मार देते हैं, गोली गले मे लगते ही वो जमीन पर गिर पड़ता है। भगत सिंह उसके सामने आता है,अंगारा उगल रहीं भगत सिंह की आंखें देख कर सेंडर डर जाता है, और थर थऱ कांपने लगता है। फिर भगत सिंह सेंडरस की खोपडी को निशाना साधते हुए उस पर तीन गोली दाग देता। गोली लगते ही, सेंडर वहीं पर डेर हो जाता है। गोली मारते ही भगत सिंह और राजगुरु भी वहां से साइकिल से फरार हो जाते हैं। इस घटना के बाद पुलिस पागलों की तरह भगत सिंह और राजगुरु को ढूंढ ने में जुट गई। चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह को पहचाने जाने के डरसे बाल और दाड़ी कटवाने के लिए कहते है। और इस तरह एक सरदार अपनी दाड़ी और बाल कटवा कर हेट पहन लेता है। भगत सिंह की नजर में धर्म से बड़ा देश था

क्रांतकारियों द्वारा बनाया गया पहला बंब का सफल परिक्षण झांसी शहर में किया जाता है, और इसके बाद सभी एक दुसरे से विदाई लेकर अपने अपने काम में लग जाते हैं। उसी दिन दिल्ली असेंबली में दो कानून पास होने वाले थे, पहला कानून मजदूरों की हड़ताल पर रोक लगना और दुसरा आजादी की लडाई को कुचलना था। बटकेश्वर दत्त, भगत सिंह, भगवती चरण और सुख देख एक साथ बैठे हुए थे। कानून पास होने की बात को लेकर काफी चिंतित थे। भगवती चरण ने कहा कि इस कानून के बनने से पहले कुछ करना होगा। इस पर भगत सिंह ने कहा कि हम असेंबली में बंब फेंक कर इस साभा को भंग कर देंगे। तब सुख देव कहते हैं इसके लिए सभा की रचना को समझ कर काम को अंजाम देना होगा। और फिर सभी लोग इस काम को सफल बनाने में जुट गए। गेलरी में भगत सिंह और वटकेश्वर दत्त बैठ जाते हैं। भगत सिंह की नजर सर जॉन बूसटर पर थी। सर जॉन बूसटर जैसे ही बोलने के लिए उठे भगत सिंह ने सभा के बोचों बीच हथगोला फेंक दिया लोग कुछ समझ पाते इसके तुरंत बाद वटकेश्वर दत्त ने दूसरा हथ गोला फेंक दिया। वाय सारय शांत खडे़ थे तभी भगत सिंह उनकी मेज पर रखे गुलदस्ते में गोली मारकर भगत सिंह अंग्रेजी सरकार के कायदे कानून की धज्जीयां उडा देते हैं। और पूरा वातावरण धुंध से भर जाता है। तुरंत ही पुलिस दोनों पर झपट पड़ती है और दोनों को गिरफ्तार कर लेती है।
भगत सिंह और वटकेश्वर दत्त दोनों ही इंकलाव जिंदावाद और वंदे मातरम को नारा लगाते हुए बहार आते हैं। सेशन जज मिडिलटन के समक्ष बंब कांड का मुक्दमा शुरु होता है। अदालत में भगत सिंह कहते हैं कि........सवत्रंता प्रतेक का जन्म सिद्ध अधिकार है, इन जुल्मी नियमों और कानूनों के प्रति जनता को जागरुक करना, सरकार को चेतावनी देना, जन जन में क्रांती की ज्वाला जगाना ही हमारा उद्देश है, और आज हमारा उद्देश पूरा हो गया ।
सेशन जज ने भगत सिंह को उर्म कैद की सजा सुना दी। उधर लाहौर में सुखदेव और अन्य क्रांतकारी बंब बनाने में लगे थे। बंब में इस्तमाल होने वाले कवचों को एक लौहार की दुकान पर सुखदेव बनवा रहे थे। एसेंबली में बंब फैंके जाने के मामले को लेकर शहर में जगह जगह गुप्तचर पुलिस लगी हुई थी। इनही गुप्तचरों में से एक की नजर लौहार की दुकान पर पड़ जाती है, जहां सुखदेव करतूसों के लिए कवर बनवा रहे थे। जैसे ही सुखदेव लौहार की दुकान ने बहार निकलते है, उनके पीछे गुप्तचर पुलिस लग जाती हैं। और सुख देव को धेर कर पकड़ लेती है। हावालात में सुख देव की बेरहमी से पिटाई की जाती है वो कुछ नहीं बाताते है, लेकिन अन्य कार्यकरता क्रांतकारियों के राज का पर्दाफाश देते है, जिसके चलते जगह-जगह छापे मारी की जाती है, और कई जगहों से लोगों को गिरफ्तार किया जाता है।
उधर सेंडरस की हत्या में भगत सिंह के शामिल होने की खबरें आने लगती हैं, जिसके चलते भगत सिंह को लाहौर सेंट्रल भेज दिया जाता है। इधर राज गुरु को महाराष्ट्र से गिरफ्तार करके सेंट्रल जेल में डाल दिया जाता है। उन दिनों सेंट्रल जेल में कैदी राज बंदी होते थे। जेलों में बंद कैदियों ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ उपवास शुरु कर दिए। इसे गुस्साए पुलिसवालों ने कैदीयों के साथ जोर जबरदस्ती से खाना खिलाना शुरु कर दिया, इतना ही नहीं कैदियों की छाती पर बैठ कर उनके मुंह में खाना ठूसना शुरु कर दिया। लेकिन क्रांतकारी नहीं बदले। हर तरफ जेल में एक ही नारा सुनाई पड़ता था। अंग्रेजी सरकार मुर्दावाद।

रात्री के समय जेल में देश भक्ती के गाने गाए जाते थे और भगत सिंह और सुखदेव की बेडियों से तो और ही सुर निकलता था। संपूर्ण पंजाब और बंगाल में अंतोष की लहर दौड़ गई। साथ ही साथ अन्य राज्यों में भी इस ये लहर का असर देखने को मिलने लगा। असंतोष की इस लहर को देखते हुए, वायसराय इरविन ने लाहौर कि स्पेशल ट्रिब्यूनल के समक्ष भगत सिंह को पेश होने को कहा गया। तीन न्यायधिशों की बैंच के बीच मामला शुरु हुआ। इस समिति का फैंसला अंतिम बनाने के लिए पुन: अपील पर रोक लगा दी। भगत सिंह ने इस बैंच में कहा कि तुम्हारी ये समिति प्रजातंत्र के खिलाफ है, तुम्हारे सामने जो अत्याचार हो रहे हैं उनको रोकने में तुम असमर्थ हो। इस बात पर आपत्ती जताते हुए न्यायमुर्ती ने मेज पर हथाड़ा ठोकते हुए कहा कि न्यायालय पर आरोप लगाना तुम्हारा काम नहीं है। तुम तो सिर्फ अपने बचने की बात करो। मैं तुम्हें कल तक का समय देता हूं। इस पर राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह ने हाथों में लेकर इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाया।
7 अक्टूबर,1930 को उनको फांसी की सजा सुना दी गई। दूसरे ही दिन ये खबर पूरे देश में आग की तरह फैल गई। समाचार पत्रों ने सरकार की नितियों के खिलाफ उंगली उठाई गई। हर तरफ सरकार की बुराई होने लगी। फांसी की सजा होते ही मंदिरों,मसजिदों और गुरुद्वारों में क्रांतकारियों के लिए दुआए मागे जाने लगीं। इधर जनता के प्रतिनिधियों ने महात्मा गांधी से मामले में दखल देने को कहा लेकिन महात्मा गांधी जी ने इस मामले में कुछ भी करने से साफ इंकार कर दिया। फिर प्रतिनिधियों ने जेल जाकर भगत सिंह से अंग्रेजी सरकार से छामा मागने को कहा, जिसे तीनों ने नकार दिया।
24 मार्च को तीनों को फांसी देने का निश्चय किया गया। फांसी लगने से ठीक एक दिन पहले भगत सिंह के बूड़े दादा जी और उसकी मां उससे जेल में मिलने जाती हैं। भगत सिंह के दादा अपने लाड़ेले को बेड़ियों में जकडा देखकर बहुत बेदना हुई। सिंह ने हंसते हुए अपने दादा जी से कहा है, हम लोग राजबंदी है, वो लोग हमें सोने के गहनों से थोड़े ही सजाएगें। ये लोहे के गहने है। ऐसा सुनकर भगत सिंह की मां की आंखों भरआईं। सिंह अपनी मां के पास गया ओर कहा कि लोग क्या सोचेंगे की भगत सिंह की मा इतनी कमजोर और कायर है। इतना सुनते ही भगत सिंह की मां के मन में अपने बेटे के लिए अभीमान जाग उठा।
24 मार्ट करीब आ रही थी। फांसी की तैयारीयां तेज होने लगी। उसी दिन अधीकारियों की एक गुप्त मिटिंग होती है, मिटिंग में अधीकारिओं की चिंता का करण भगत सिंह की बढ़ती लोकप्रियता थी। अधीकारिओं को फांसी के दिन पूरे देश में हिंसा और दंगा भड़कने का डर सता रहा था। तब इस मिटिंग में भगत सिंह को एक दिन पहले यानी 23 मार्च को फांसी देने का निर्णय लिया गया। 23 मार्च की सुबह हुई। भगत सिंह की कोठरी का दरवाजा दोपहर को खोला जाता है। तभी जेलर कहता है कि आज ही तुम को फांसी होगी। भगत सिंह किताब रख कर बोलता है कि मैं तैयार हूं। मेरी बेडि़या खोल दो। और मेरा चहरा मत ढकना। जेलर कहता हैं कि मैं बेडि़या तो खोल दूंगा, लेकिन चहरा को तो ढकना ही पढेगा। इस नियम को नहीं तोड़ा जा सकता। उस दिन सभी कैदियों को समय से पहले ही उनको कोठरियों में बंद कर दिया जाता है। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु तीनों ने स्नान किया। तीनों ने एक दुसरे को गले लगाया। बीच में भगत सिंह, बांय तरफ राजगुरु और दांय तरफ सुखदेव के कदम फांसी के तखते की ओर चल पड़ते हैं। जेलों में बंद कैदी अपने लाड़ले क्रांतकारियों को आंसूओं कि विदाई देने लगे। तीनों का बुलंद सुर जेल में गूंज रहा था, कि मेरा रंग दे बसंती चोला। कैदी नारा लगा रहे थे, भगत सिंह अमर रहे, सुखदेव अमर रहे, राजगुरु अमर रहे। फिर तीनों क्रांतकारियों ने इंकलाव कहते हुए कैदियों से विदाई ली। उनके खुले हाथ देखकर अंग्रेज कमीशन को धक्का लगा। सिंह ने उनसे कहा कि आप बहुत भाग्यशाली है कि आज आप को साक्षात देखने को मिलेगा कि भारतीय क्रांतकारि किस तरह मौत को गले लगाते हैं। मौत मतलब... परमेश्वर। उनसे मिलने जैसा दूसरा आनंद और क्या होगा। तानों ने बंदे मातरम का नारा लगाया और फांसी के तखते पर पहुंच गए।
फांसी का फंदा तीनों का इंतजार कर रहा था। तभी भगत सिंह ने निर्भय होकर कहा की हमें अपने उदधोश वाक्य कहने की अनुमति दी जाए। जेल अधीकारियों ने एक दूसरे को देखकर इशारा किया। फिर तीनों ने बंदे मातरम का नारा लगाते हुए कहा कि अब दोस्तों हम स्वर्ग में मिलेंगे। जल्लाद ने तीनों का मुंह कपडे़ से डक दिया। और इशारा मिलते ही। हत्था खींच दिया गया। और इस तरह भारत माता के तीनों पुत्र उसके लिए शाहीद हो गए।

विष्णु सोनी

Tuesday, October 13, 2009

Press vs People



आज मीडिया में दिखाए जाने वाली खबरों को लेकर हमेशा सवाल उठाए जाते हैं,कि मिडीया क्या दिखा रहा है,किस तरह की खबरें दिखाई जा रहीं हैं। मिडीया का स्तर गिरता जा रहा है। मैं आप से सहमत हूं,कि आज का मिडीया गैरजिम्मेदार हो गया है। लेकिन मैं आप से एक सवाल पूछना चाहता हूं,कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है:चैनल या फिर हम दर्शक?। हम लोग ही तो एसे दिखाने के लिए मजबूर करते हैं। सच का सामना शो ने पहले ही दिन रिकॉर्ड तोड़ दिया। हिट तो हम दर्शकों ने किया... फिर चैनल को दोष क्यों दिया जा रहा है। चाहते तो हम इस शो को न देख कर इसको धुल चटा सकते थे,जिससे आने वाले समय में इस तरह के शोज पर अपने आप ही रोक लग जाती...और कोई प्रोड्यूसर ऐसा कार्यक्रम बनाने कि हिम्मत नहीं जुटा पाता,लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। हम दर्शक अच्छे कार्यक्रम देख कर अच्छे शोज को बढ़ावा क्यों नहीं देते। एक चैनल को बनाने में करोडों रुपय खर्च होते हैं। इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा जी को कहते हुए सुना था, कि जब चैनल शुरु किया गया था तो गम्भीर खबरों को दिखाया गया था लेकिन दर्शकों ने इन की खबरों को महत्व नहीं दिया और चैनल इतने घाटे में चला गया,कि जिंदगी भर की कमाई चली गई और वो दिन दूर नहीं था,कि जब वो फुटपाथ पर आ जाते और फिर मजबूरी में उनको भूत प्रेत का सहारा लेना पड़ा,दूसरा उदाहरण मैं आप लोगों को NDTV इंडिया को देता हूं। NDTV इंडिया सालों से गम्भीर खबरें दिखाता आया है,लेकिन हम दर्शकों ने उस चैनल की गम्भीरता को कोई महत्व नहीं दिया और चैनल पिछड़ने लगा। चाहते तो हम दर्शक इसकी खबरों को देख कर सबसे उंचा पहुंचा देते,और ऐसा मानक सेट करते की सारे चैनलों को मजबूरी में देश और समाज से जुड़ी खबरें दिखानी पड़ती,लेकिन दर्शको को ये सब रास नहीं आता और दर्शकों ने साबित कर दिया की हमें भूत प्रेत ही देखना है,हमें तो राखी सावंत को देखना है..करीना और सैफ की किस का किस्सा सुनने में ही मजा आता है। आज गौर किया जाए तो NDTV इंडिया भी अब देश और दुनिया या फिर समाज से जुड़ी खबरों के साथ ही साथ यू ट्यूब विडियो के मनोरजन से भरे को क्लिप दिखाने लगा है। खबरों से समझौता शुरु हो गया है। हम लोगों ने उस को मजबूर कर दिया है कि अगर चैनल चलाना है तो आप को भी भूत प्रेत या मसाला टाईप का कुछ आइटम पेश करना ही होगा,तभी चैनल चल पाएगा। सो NDTV इंडिया टावी भी अब खबरों के साथ खेल रहा है। उसे भी दर्शकों का टेस्ट पता है। उसके पास भी दर्शक के लिए अच्छा मैनू है। वो वही परोसेगा दो दर्शक देखना चाहेगा। इसके लिए जिम्मेदार कौन है चैनल या फिर हम दर्शक। रिमोट आप के हाथ में है। चुनाव आप को करना है।

विष्णु सोनी

Wednesday, August 19, 2009

Dedication and devotion of a Maa









Maa is a adorable word!
Sweetness of this word,
Gives me a lot of pleasure and peace!
It is the bank of motherness,
And selfless love, the ocean of
Mercy, feelings of pity and compassion!
It is the treasure of happiness and kindness!

Maa is an idol of love and faith!
The course of her life is
Full of pain and pleasure,
Struggle and achievements!
She ever brings a smile,
On the face of her children,
And equally loves son and daughter!
She does not know
What rest and leisure are!

Her work is endless and selfless,
And play different kinds of roles
On the stage of her life!
Sometimes she becomes an ideal teacher,
Sometimes her children best friends!

Her inspirations and Divine bless,
Remains with us when we are,
Intangle in the Whirlpool of woes!
She reduces our pain and trouble be her consolation!
When we put ourselves into darkness,
Grip into the net of trouble,
Then she fetches the ray of hope!

Sometimes she partakes in our,
Joy and sorrow like a true friend of ours,
And giving the knowledge of,
Our family values and society,
Humanity culture make an ideal person!
In other hand,
We can say,
We have got the Godess in the form of mother!

Vishnu Soni

Tuesday, February 3, 2009

Dogs In Slum


Slumdog millionaire movie is based on a novel by india Diplomat vikas swarup's book Q and A. Before Slumdog millionaire movie, no one knew about this novel. But as a director from British comes to India, makes a movie on children living in slum in India, so called calls the worest insult to India. it is an insult to poverty, some of them are upset with the movie, because a white man put it on the BIG screen.

A group of slum dwellers with roses and a Stray dog for company, gathered out side of actor Anil kapoor'juhu office for changing the name of m0vie. I am very surprised to know that how a 13 years old boy can understand that the film is an insult to India, another boy name Vikas Nathu a slum dweller, who talks with wisdom that is is an insult to poverty. I am sure these innocent children are not being able to understand what is going on around them.

The matter of fact is this, this is a challenge to Bollywood. The core issue is not showing the poverty to the whole world, but real issue is, Bollywood could not make the movie as beautiful as they did it. it makes to difference whether it get the Oscar or not. Movie is also the part of mass media, so it must be given the freedom of expression. Every out skirt of city in India, slum dwellers could be found, be it Delhi, mumbai or anywhere else in India. Problem is, we could not feel the pulse of slum dwellers life as they did it. There are not Indian, despite of that how deeply they touch the life of slums, is really admirable.

Indain are very hypocrite, not ready to accept the truth and raises the nonsense issue. These so called contractors of our society and country have nothing to do, but just to wait for this sort of opportunity to bring themselves in the lime light.They can yell but can do nothing for the betterment of their lives. we all must see ever day at the red light the innocent children sailing books, cleaning windows of cars, some times could be seen juggling as a car stops just for the survival of their families, we people pass by the road seeing all this happing but cannot do anything for these poor children but yell. This is what we are...


vishnu



Saturday, January 17, 2009

लेडी ऑन मिशन इम्पॉसिबिल....इरोम शर्मिला



मनीपुर आयरन लेडी इरोम शर्मिला पिछले आठ सालों से सेना के विशेषाधिकार (अर्मड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट)
के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठी है। पर उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
जब मैं उससे दिल्ली के राम मनोहर लोहीया अस्पताल में मिला तो उसको देखकर मेरे मुंह से सिर्फ एक ही बात निकली..... ' हे भगवान इस लड़की ने अपनी क्या हालत बना ली है'।
दुबला शरीर लेकिन चहरे पर तेज लिए हुए कम्डोजों के बीच हॉस्पीटल में टहलती रहती है। कोई प्रैस वाला उससे नहीं मिल सकता। उसके भाई के अलावा किसी को मिलने की इजाजत नहीं है। उसके समर्थक भी उस को दुर से देखकर चले जाते हैं । उसको जबरदस्ती खाना खिलाने के लिए उसकी नाक में नली डाल रखी है, जिसके द्वारा उसको दूध देकर जिंदा रखा जा रहा है। उसके दिन की शुरुआत योगा से होती है। नेलशन मंडेला और गांधी जी उसके आदर्श हैं
सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून सन 1958 से उत्तर-पूर्वी राज्यों में लागू है। यह एक ऐसा कानून है, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को महज शक के आधार पर गोली मारने या गिरफ्तार करने का अधिकार सुरक्षा बलों को हासिल है। इस कानून के चलते यहां आए दिन बलात्कार और निर्दोशों को गोली से मारे जाने की घटनाएं सामने आती रहती हैं।
महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने वाली इस लड़की के सत्याग्रह की ओर किसी का कोई ध्यान नहीं जा रहा है। भूख हड़ताल के चलते उसका हर दिन स्वास्थ्य गिरता जा रहा है, जिससे उसके शरिर पर काफी बुरा असर पड़ रहा है।
दो नवंबर, 2000 को दस लोगों को कथित तौर पर असम रायफल के जवानों द्वारा मार दिया गया था। इस धटना से विचलित हुई इरोम शर्मिला ने हादसे के ठीक दूसरे दिन से ही सेना के विशेष अधिकार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठ गई तब से लेकर आज तक उसका अमरण असन आद तक बदसतूर जारी है।
लेकिन दुर्भागपूर्ण जब वो उस काला कानून को खत्म केरने की मांग को लोकर धरने पर बैठी तो पुलिस ने इसे आत्म हत्या करने का प्रयास बताकर उसे गिरफ्तार करके सलाफों के पीछे डाल दिया। कहने को तो हम लोकतांत्रिक देश में रहते है, लेकिन यहां पर कानून लोगों के आधार पर तय किए जाते हैं ।
लेकिन यही धारना अगर ममता बैनर्जी करती हैं तो उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया जाता है। और सरकार को उनकी बिगड़ती स्थिति को देखते ही, केंद्र सरकार का सिंघासन ढगमगा जाता है, और उनकी मांग को एक महीन के भीतर ही मान लिया जाता है। क्या इसलिए कि ममता बैनर्जी एक बरिष्ठ नेता है ओर ईरोम शर्मिला एक छीटी सी सामाजिक कार्यकरता या फिर कोई और बात जिसके चलते कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
सरकारें आईं और चली भी गईं, लेकिन उसको हर बार आश्वान दे दिया जाता है। दिसंबर 2006 को प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह मनीपुर का दौरा करते हैं, लेकिन मनीपुर की आबाम को इस कानून में संशोधन करने का आश्वासन देते हैं। लेकिन इस अश्वासन को ठुकरा दिया जाता है, क्योंकि इरोम शर्मिला को मानना है कि सिर्फ सशोधन से कुछ नहीं होने वाला।
30 जनवरी को सत्याग्रह की शताब्दी पर दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन किया जाता है, जिसमें गांधी जी के गांधीवाद, सत्याग्रह और अंहिसा की जोरदार वकालात की जाती है। लेकिन चर्चा नहीं हुई तो इरोम शर्मिला के अंहिसक विरोध की जो बिना कुछ खाए पीए बदस्तूर जारी है। जब इस सम्मेलन के दौरान कुछ मंत्रीयों से इरोम शर्मिला के बारे में पूछा गया, तो गोल मोल जवाब देते नजर आए, ये है गांधीवाद की बातें करने वालों का असली चहरा। इस सम्मेलन से ऐसा लगता है, कि कांग्रेस महात्मा गांधी को सिर्फ राजनितिक स्वार्थ के लिए ही इस्तमाल करती है।
गांधीवाद की बात तो करती है, लेकिन इसको असल जिंदगी में लागू करना इसके लिए बहूत मुश्किल है। लगे रहो मुन्ना भाई फिल्म में गांधीगिरी की जमकर तारीफ की जाती है। हमारे प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी को भी खूब रास आती है। लेकिन मनमोहन जी को भी इरोम शर्मिला की याद नहीं है। आज गांधी की प्रसंगिता कितनी है, कहना मुश्किल है। आज गांधीवाद किताबों और फिल्मों तक ही सिमट कर रह गया है। अगर ऐसा नहीं होता तो आज बेचारी इरोम शर्मिला की बात पर गोर किया जाता और कुछ न कुछ समाधान जरुर निकाल लिया जाता। और गांधी के आदर्श ढोंग बनकर नहीं रह जाते, बल्की उनका असल जिंदगी में अमल होते दिखाई देता।
गांधीवाद के पथ पर चलने वाली इस लड़की की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। पिछले कई सालों से इस आस में बैठी है कि शायद अब उसकी मांग पर ध्यान दिया जाएगा, लेकिन खत्म करना तो दूर इस मुद्दे पर अबतक कोई गंभीर चर्चा तक नहीं हुई। उस का स्वास्थ्य बहुत गिर चुका है। अगर उसको कुछ हो जाता है, तो उसका जिम्मेदार कोन होगा..?

विष्णु सोनी