Saturday, January 16, 2010

मैं हूं रुचिका




मै हूं रुचिका। मैं अपनी जिंदगी से बहुत खुश थी। सब कुछ अच्छा चल रहा था। मेरी पड़ाई और टेनिस प्रैक्टिस भी।
मैं टेनिस में कुछ करना चाहती थी। मैं मोनिका सैलेश और सटैफी ग्राफ की तरह बनना चाहती थी। लेकिन मुझे क्या पता था कि ये मेरी जिंदगी को बरबाद कर देगा। मेरे परिवार को उजाड देगा।

मैं और अराधना रोज शाम को टेनिस प्रक्टिस करते थे। और राठौर अंकल टेनिस कोर्ट के कोर्नर से लड़ियों को टेनिस खेलते देखते रहते थे। इस बीच मुझे केनेडा जाने वाली थी। तभी राठौर अंकल मेरे धर पर आए और मेरे पापा से कहने लगे... की इस कि टेनिस प्रैक्टिस अच्छी चल रही है। उसे अभी केनेडा नहीं जाना चाहिए। जब शाम को पापा ने मुझे बताया कि आज राठौर अंकल मिलने आए थे। वो इतने बडे़ ऑफिसर होने के बाद भी मेरे घर मुझसे मिलने आए। मैं एसा सुनकर खुशी से झूम उठी।

हर दिन की तरह मैं और मेरी फ्रेंड अराधना दोनो टेनिस खेल रहे थे। तभी मेरे पास बॉलबॉय आया और कहा की राठौर सर बुला रहे है। मुझे लगा वो कोचिंग के बारे में बात चाहते होंगे। मुझे खेलने की नई टिप्स चाहाते होंगे।ग लेकिन जैसे ही मैं रुम में पहुंची। वहां का माहौल बदला हुआ सा लग रहा था । मुझे अंदर से बहुत डर लग रहा था। एक चेयर मगबाई गई। अराधना उस चेयर पर बैठ गई। तभी राठौर अंकल अराधना से कोच को बुला लाने के लिए बोला जाता है। और फिर अराधना के जाते ही राठौर के अंदर का शैतान जग उठता है। तभी राठौर अंकल अपने कुर्सी से उठते है और मेरे पास आने लगताेहै। मैं परेशान हो गई.. की राठौर अंकल को अचानक क्या हो गया। वो मेरे पास आए और अपना एक हाथ मेरी कमर पर रख दिया और वो मुझे अपनी ओर खींचने लगे। में समझ नहीं पा रही थी कि क्या करु और क्या नहीं। मैं इस का विरोध करने लगी। इस बीच अराधना वापस आती है। ओर वो मुझे इस हालात में देखकर परेशान हो जाती है। उसकी आंखे फटी की फटी रह जाती हैं। कि आखिर ये राठौर कर क्या रहे है। तभी मैं राठौर की इस हरकत के बाद में वहां से दौड़कर रोती हुई चली जाती हूं। राठौर अराधना से शांत रहने के लिए बोलते है और ये कहते है कि मैं वही करुंगा जो वो चाहती है।

अगले दिन मैं फिर टेनिस खेलने जाती हैं। और फिर से मुझे बुलाया जाता है। मै हैरान हो हई। मैं डर गई। मुझे लगा आज फिर मैंरे साथ वही होगा जो उस दिन हुआ था। और मुझे लगा कि ये शायद खामोश रहने के कारण राठौर की हिम्मत बढ गई। तब मैंने अपने पापा को बताया और बताते बताते मैं रोने लगी. तभी मेरे पापा ने कहा कि अराधना के मां को बता दो मैं भी अभी आ रहा हूं। इस घटना के एक साल पहले मेरी मां इस दुनिया से चली बसी थी। और अब अराधना की मां को ही मैं अपनी मां समझने लगी थी। अराधना की मां को बाताते ही मेरी आंखों से आंसूऔं की धार बहने लगी। मुझे रोते देख अराधना की मां ने मुझे गले लगा लिया।

राठौर की इस हरकत के खिलाफ मेरे पिता ने मुख्यमंत्री और गृह सचिव को राठौर की शिकायत की। लेकिन राठौर का कुछ नहीं हुआ। उसकी ताकत के चलते सब आंख-कान बंद करके बैठे रहे। अगले दिन जब मैं टैनिस खेलने पहुंची तो मुझे पता चला की मुछे टेनिस खेलने क्लब से निकाल दिया गया है। मेरे साथ जो राठौर ने किया उसे लेकर में परेशान रहने लगी। स्कूल में सभी से अलग रहने लगी। मैं क्लास में रोती है रहती थी। मेरे साथ जो हुआ उसे बोझ मै उठा नहीं पा रही थी। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करु। केस को वापस लेने के लिए मेरे भाईया पर कई झुठे मुक्कदमे लागा दिए गए। मेरे आंखों के सापने उसको हथककड़ी पहनाकर मोहल्ले में घूमाया गया। मेरे भाईया आशू पर हो रहे जुल्म को में सह नही पाती थी। हर शाम की तरह इस शाम को हम सब घर में बैठे हुए थे। तभी

आचानक पुलिस मेरे घर पर आती है। और मेरे भाईया आशू को उठाती है। और बहुत बेरहमी से पीटना शूरु कर देती है। मै अपने भाईया को एसी हालत में देख कर में चीख-चीक कर रोने लगती हूं। चिल्लाने लगती हूं। लेकिन किसी कोई भी मेरी आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। मैं कुछ नहीं कर पा रही थी। मैं बहुत बेचेन हो गई। मेरे आंसू रोके नहीं रुक रहे थे। मै अंदर ही अंदर टूटने लगी। मेरे परिवार पर होने वाले राठौर के अत्याचार के लिए मैं अपने आप को जिम्मेदार मानने लगी। तभी मेरे पापा मुझे आकर समझाते है,सत्वना देने लगते है, कि बेटा धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा। अपने पापा की में सबसे लाड़ली बेटी थी। मेरी परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही थी। पापा मुझे समझा रहे थे कि सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन मुझ पता था कि जब तक राठौर जिंदा तक कुछ ठीक नहीं होने वाला है। मैं अपने आपने आप को कोशने लगी। अगर मैंने शिकायत नहीं की होती तो मेरे परिवार को ये दिन कभी नहीं देखने पड़ते।
और कगले ही दिन मेरा शरीर बाथरुम में मिलता है, मेरे पापा मुझे लेकर तुरंत हॉस्पीटल की तरह दोड़ते है। लेकिन तब तक में इस दुनिया से रुखसत हो जाती हूं। लेकिन राठौर का अच्याचार कम नहीं होता।

और 19 साल बाद एक बार फिर मैं खबरों में आई ( न्यूज पेपर के शॉट्स)। इन 19 सालों में क्य़ा बदला। कुछ भी तो नहीं। सब कुछ पहले ही जैसा तो है। राठौर आज भी हंस रहा है। और मैंरे पापा आज भी रो रहे हैं। मेरे पापा आज भी डरे हुए हैं। और भाई आशू आज भी सामने आने से डरता है। उसे डर है कि राठौर के आदमी आज फिर उसे बेरहमी से पीटेंगे और सलाखों के पाछे डाल देंगे। कई केंडल मार्चस और न्यायालय के बावजूद भी मेरा परिवार आज बी राठौर से डरा हुआ और सहमा हुआ है। मैं 19 साल पहले मरी थी लेकिन आज भी मेरी कहानी अधूरी है। अपनी मौत के बाद में अभी भी न्याय का इंतजार कर रही हूं। जो मुझे नहीं मिला।

विष्णु सोनी